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Friday, June 21, 2013

हमें मालूम ना था

तबाही का सिलसिला ,

यूँ शुरू होगा ,

हमें मालूम न था ,

मन्नत मांगी थी,

जिस बारिश की हमने ,

उसके आने के बाद,

मंज़र ये होगा,

हमें मालूम न था ,

खुद भगवान भी बह जायेंगे,

धारा में जल की ,

बर्बर और रोद्र रूप ,

ऐसा प्रकृति का होगा,

हमें मालूम ना था,

गुजारिश करते है,

उस रब से,

फिर ऐसा मंजर ना हो कभी ,

हमारी गलतियों का ,

ऐसा अंजाम होगा ,

हमें मालूम ना था,,,,,,,,,,,,,,



22 comments:

  1. किसे मालूम था.....
    शायद खुद खुदा भी पशेमां होगा
    :-(

    अनु

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    1. बिलकुल सही कहा अनु जी

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  2. प्रकृति के इस रौद्र रूप और ऐसी तबाही का अंदाज़ा किसी को न था. अच्छा लिखा है, शुभकामनाएँ.

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    1. आभार डॉ शबनम जी

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  3. कुदरत के इस कहर के शिकार लोगों और उनके परिवारों के प्रति हार्दिक संवेदना .. आपकी यह उत्कृष्ट रचना कल दिनांक २२ जून २०१३ को http://blogprasaran.blogspot.in/ ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है , कृपया पधारें व औरों को भी पढ़े...

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    1. आपका बहुत आभार शालिनी जी

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  4. हमारी गलतियो का ऐसा अंजाम होगा हमें मालूम न था ....बहुत अच्छा लिखा है ....ये ही विडंबना है,की हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते समय उसके प्रतिरोध को याद नहीं रखते ...

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    1. आभार पारुल जी

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  5. बहुत ही सुन्दर ....और सचेत करनेवाले विचार... जागो रे !

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  6. बहुत ही सुन्दर ....और सचेत करनेवाले विचार... जागो रे !

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  7. सामयिक ..भाव पूर्ण प्रस्तुति

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    1. आभार ज्योति कलश जी

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  8. सच कहा, हमें कहाँ मालूम था ।

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  9. आपकी हर रचना की तरह यह रचना भी बेमिसाल है !

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    1. आपका बहुत आभार संजय जी

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  10. सही कहा किसे मालूम था कि तबाही का ऐसा मंजर होगा ....

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    1. आपका बहुत आभार रंजना जी

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  11. बहुत ही सुन्दर . सचेत करनेवाले विचार. आभार

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