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Sunday, September 22, 2013

बहुत दिनों से इस गजल को तलाश रहा था , आज ये मिल गयी,बहुत प्यारी गजल है, आप एक बार इस पर नजर डाले,,, अदम गोंडवी जी की एक बेहतरीन गजल है ये 





हिन्‍दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए
अपनी कुरसी के लिए जज्‍बात को मत छेड़िए


हममें कोई हूणकोई शककोई मंगोल है
दफ़्न है जो बातअब उस बात को मत छेड़िए


ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीजुम्‍मन का घर फिर क्‍यों जले
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए


हैं कहाँ हिटलरहलाकूजार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सबक़ौम की औक़ात को मत छेड़िए


छेड़िए इक जंगमिल-जुल कर गरीबी के खिलाफ़
दोस्त मेरे मजहबी नग़मात को मत छेड़िए 



Thursday, September 12, 2013

दर्द

आज काफी दिनों के बाद ब्लॉग पर आया हूँ, मेरा शहर भी दंगो की चपेट में था , जो कुछ भी इन दंगो में हुआ है, मैंने तो बस इंसानियत का क़त्ल होते देखा है , दिल बहुत दुखी है , एक गजल कहने की कोशिश की है जो एक इन्सान दंगो से पीड़ित है उसके मन की व्यथा को बताने की कोशिश की है, मेरे गुरु श्री नीरज गोस्वामी जी के पारस जैसे हाथो ने इसे सवारां है , जो गलतियाँ मुझसे हुई थी उसे उन्होंने दूर किया है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

सब से छुप कर रहता था 

हर आहट पर डरता था 


बाहर से था शेर मगर 

खोफ मुझे भी लगता था 


भाई के हाथो क्यूँ कर 

भाई का घर जलता था 


भूल गया था तू शायद 

दर्द तिरे मैं सहता था 


एक धोखा था प्यार यहाँ 

खून तभी तो बहता था 






Monday, September 2, 2013

मेरे कान्हा चले आओ

लफ्जो की है मज़बूरी

तुम नजरो से समझ जाओ

कहती है राधा रानी

मेरे कान्हा चले आओ


माखन की मटकी अब

तड़फती है टूटने को

कहती है ये मटकी भी

मेरे कान्हा चले आओ


बचपन की अटखेलियाँ

वो जंगल वो गऊ मईया

कहती है आज फिर से

मेरे कान्हा चले आओ


वियोग की बेला है ये

अब ना और तडफाओ

मिलन की घड़ियाँ कहती है

मेरे कान्हा चले आओ

मेरे कान्हा चले आओ

डॉ शौर्य मलिक