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Tuesday, August 27, 2013

साहब

बहर २२२२२२२२२२२२२२२२ 

मजहब की बातो पर ना जाने क्यों मर मिटते हो साहब 

चाल सियासतदारो की क्यों जान नहीं पाते हो साहब 


जाने अनजाने हर बार बहक जाते हो बातो में इनकी 

जो बीत गयी है उन बातो से कहाँ सिखते हो साहब 



सबको मंजिल तक साथ निभाने का भरोसा दे कर के 

बीच सफ़र में ही क्यों वादा तोड़ चले जाते हो साहब 



झूटी शानो शोकत और पैसो के चक्कर में भी तो

जीवन में अपने प्यारो से ही धोखा खाते हो साहब 



जीवन की राहो में 
तुम गिरकर सम्हल जाते हो लेकिन 

मोहब्बत की गलियों में क्यों हर बार गिरते हो साहब 

13 comments:

  1. झूटी शानो शोकत और पैसो के चक्कर में भी तो

    जीवन में अपने प्यारो से ही धोखा खाते हो साहब
    bahut sundar bhavabhivyakti .krishn janam ashtmi kee hardik shubhkamanyen .

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  2. आज का सच लिए हुए अच्छे ख्याल हैं.

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  3. झूटी शानो शोकत और पैसो के चक्कर में भी तो

    जीवन में अपने प्यारो से ही धोखा खाते हो साहब .... sateek baat

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  4. एक सुंदर बेहतरीन रचना ....साहब ...बधाई ..

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  5. बहुत सुंदर भावपूर्ण और बढ़िया प्रस्तुति !!

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  6. जीवन में अपने प्यारो से ही धोखा खाते हो साहब

    यकीनन !!

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  7. वाह वाह वाह
    सुन्दर ताने-बने और सीख-सुझाव देती
    ये आपकी सुन्दर सोच से उपजी लाज़वाब अल्फ़ाज़ लिए
    एक बेहतरीन ग़ज़ल
    बधाई

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  8. बहुत ही बढ़िया रचना..
    बेहतरीन...
    :-)

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  9. jivan ka sach hai bahut sahi kaha aapne

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  10. एक सुंदर बेहतरीन रचना ....साहब ...बधाई .. वाह वाह वाह

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  11. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - बुधवार- 28/08/2013 को
    हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः7 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra

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  12. बहुत अच्छा लिखा है आपने

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  13. जीवन की राहो में तुम गिरकर सम्हल जाते हो लेकिन
    मोहब्बत की गलियों में क्यों हर बार गिरते हो साहब ...

    ये वो गालियाँ हैं जहां एक बार गिर के उठना आसान नहीं .... शायद नामुमकिन भी है ...
    लाजवाब शेर है ...

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