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Wednesday, January 8, 2014

बस उसे थोडा सा प्यार जरुरी है ...............................

दिल का सुखद एहसास
सबकी आँखों का नूर
हर घर की शान है
जरूरते बहुत थोड़ी है
बस उसे थोडा सा प्यार जरुरी है

बिन बोले वो पढ़ लेती है मुझको
उसके बिन जिंदगी अधूरी है
कभी कोई गिला शिकवा नही
जितना मिल जाये वही काफी है
बस उसे थोडा सा प्यार जरुरी है

उगता हुआ सूरज या चाँद की चाँदनी
उसकी चमक के आगे बेमानी है
हर माँ बाप के दिल का ख्वाब होती है
क्योंकि बेटियाँ कुछ खास होती है
बस उसे थोडा सा प्यार जरुरी है

डॉ शौर्य मलिक 

Sunday, October 27, 2013

मुहब्बत रहती कहाँ

कोई बता दे पता
मुहब्बत रहती कहाँ
ढूंढ़ रहा हूँ मैं
वर्षो से उसका पता

दिल की बेकरारी है
राते जग कर गुजारी हैं
तिस्नगी को भी बढाया
तब भी ना पता लग पाया

सूरज, तारो, चाँद, तारो से पूछा
घूमते हो तुम पूरे जहाँ में
कभी कही किसी मोड़ पर
मिला तुम्हे मुहब्बत का पता

पर्वत,मोसम,पेड और पन्छी
धुप ,छाव,सर्दी और गर्मी
सबसे मैंने बस यही पूछा
बताओ मुहब्बत रहती कहाँ

धीमे धीमे होले होले
सब मंद मंद मुस्काते है
लगता है मालूम है इनको
किन्तु मुझको नहीं बताते है

सरिता , सागर  और तालाब
सबके गया किनारों पर
वही पवन  ने फुसफुसाकर
मुझको बस इतना कहाँ

मुहब्बत मिलती नहीं
बस हो जाती है
दिल को एक पल में
दीवाना कर जाती है

तब मेरे दिल ने हँस कर कहा
जिसका तू ढूंढ़ रहा था पता
वो रहती हरदम मुझमे
कभी अंदर आने की जेहमत उठा

डॉ शौर्य मलिक 

Friday, October 18, 2013

रल्धू 3

आज सुबह सुबह रल्धू मेरे घर आ गया और बोलया भाई तू मेरे ऊपर फिर से कुछ लिखणे वाला है , मैंने कहा हा भाई लिख रहा हूँ , तो वो बोला हमेशा मेरा मजाक उड़ाते हो , कभी तो कुछ अर्थपूर्ण बात लिख दिया करो , मैंने कहा ठीक है भाई इस बार हास्य कम और व्यंग्य ज्यादा है , जो आजकल हमारी सोच हो गयी है उसके बारे में लिखने की कोशिश कर रहा हूँ , वैसे भी अगर  नहीं लिखा तो रल्धू कॉपीराइट का मुकदमा कर देगा मुझ पर ,  इस बार मैंने रल्धू को मुक्तक में लिखने का प्रयास किया है , आप सभी की प्रतिकिर्या की उम्मीद करता हूँ ...................

रल्धू की यारो देखो कैसी शामत आई
मेम तै करा जो ब्याह,घर में आफत आई
गिटपिट गिटपिट काटे ढेर कसूती अंग्रेजी
अरे यार  मेरे पल्ले या के जहमत आई

तडके तै साँझ ढले तक काम करे बिचारा
घर,बासन,कपडे,साफ़ करण मे मरे बिचारा
कधी पकावै आमलेट तो कधी कुक्कड़ कूँ
पैडी वाला मैनी वाला क्योर भी करे बिचारा

दूध दही की तो इस घर में थी बहती नदियाँ
अब तो उडे धुम्मा अर दारू की बहती नदियाँ
वो बोलया ब्याह कै ना लाइयो कधी मेम
देश की छोरी तै ही प्यार की बहती नदियाँ

डॉ शौर्य मालिक 

Friday, October 11, 2013

पर हम तो यारो केले है

काफी दिनों के बाद ब्लॉग पर आया हूँ , आप सभी से दूर रहने के लिए माफ़ी चाहता हूँ, कोशिश करूँगा कि अब लगातार आप लोगो के सम्पर्क में रहूँ , एक छोटी सी गजल कहने की कोशिश की है, जो गलतियाँ हो कृप्या मुझे बताये ,आप सभी के कमेंट्स का इंतजार रहेगा

दर्द सभी ने कुछ झेले है
जिन्दा वो, जो अलबेले है

बिकता है अंगूर यहाँ तो
पर हम तो यारो केले है

अनपढ़ बनते राजा देखो
खेल अजब किस्मत खेले है

प्यार,भरोसा ,रिश्तो के अब
लगते रोज़ यहाँ मेले है

चाहो जैसे तोड़ो वैसे
हम तो मिटटी के ढेले है

डॉ शौर्य मलिक 

Sunday, September 22, 2013

बहुत दिनों से इस गजल को तलाश रहा था , आज ये मिल गयी,बहुत प्यारी गजल है, आप एक बार इस पर नजर डाले,,, अदम गोंडवी जी की एक बेहतरीन गजल है ये 





हिन्‍दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए
अपनी कुरसी के लिए जज्‍बात को मत छेड़िए


हममें कोई हूणकोई शककोई मंगोल है
दफ़्न है जो बातअब उस बात को मत छेड़िए


ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीजुम्‍मन का घर फिर क्‍यों जले
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए


हैं कहाँ हिटलरहलाकूजार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सबक़ौम की औक़ात को मत छेड़िए


छेड़िए इक जंगमिल-जुल कर गरीबी के खिलाफ़
दोस्त मेरे मजहबी नग़मात को मत छेड़िए 



Thursday, September 12, 2013

दर्द

आज काफी दिनों के बाद ब्लॉग पर आया हूँ, मेरा शहर भी दंगो की चपेट में था , जो कुछ भी इन दंगो में हुआ है, मैंने तो बस इंसानियत का क़त्ल होते देखा है , दिल बहुत दुखी है , एक गजल कहने की कोशिश की है जो एक इन्सान दंगो से पीड़ित है उसके मन की व्यथा को बताने की कोशिश की है, मेरे गुरु श्री नीरज गोस्वामी जी के पारस जैसे हाथो ने इसे सवारां है , जो गलतियाँ मुझसे हुई थी उसे उन्होंने दूर किया है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

सब से छुप कर रहता था 

हर आहट पर डरता था 


बाहर से था शेर मगर 

खोफ मुझे भी लगता था 


भाई के हाथो क्यूँ कर 

भाई का घर जलता था 


भूल गया था तू शायद 

दर्द तिरे मैं सहता था 


एक धोखा था प्यार यहाँ 

खून तभी तो बहता था 






Monday, September 2, 2013

मेरे कान्हा चले आओ

लफ्जो की है मज़बूरी

तुम नजरो से समझ जाओ

कहती है राधा रानी

मेरे कान्हा चले आओ


माखन की मटकी अब

तड़फती है टूटने को

कहती है ये मटकी भी

मेरे कान्हा चले आओ


बचपन की अटखेलियाँ

वो जंगल वो गऊ मईया

कहती है आज फिर से

मेरे कान्हा चले आओ


वियोग की बेला है ये

अब ना और तडफाओ

मिलन की घड़ियाँ कहती है

मेरे कान्हा चले आओ

मेरे कान्हा चले आओ

डॉ शौर्य मलिक