बहर २२२२२२२२२२२२२२२२
मजहब की बातो पर ना जाने क्यों मर मिटते हो साहब
चाल सियासतदारो की क्यों जान नहीं पाते हो साहब
जाने अनजाने हर बार बहक जाते हो बातो में इनकी
जो बीत गयी है उन बातो से कहाँ सिखते हो साहब
सबको मंजिल तक साथ निभाने का भरोसा दे कर के
बीच सफ़र में ही क्यों वादा तोड़ चले जाते हो साहब
झूटी शानो शोकत और पैसो के चक्कर में भी तो
जीवन में अपने प्यारो से ही धोखा खाते हो साहब
जीवन की राहो में तुम गिरकर सम्हल जाते हो लेकिन
मोहब्बत की गलियों में क्यों हर बार गिरते हो साहब
मजहब की बातो पर ना जाने क्यों मर मिटते हो साहब
चाल सियासतदारो की क्यों जान नहीं पाते हो साहब
जाने अनजाने हर बार बहक जाते हो बातो में इनकी
जो बीत गयी है उन बातो से कहाँ सिखते हो साहब
सबको मंजिल तक साथ निभाने का भरोसा दे कर के
बीच सफ़र में ही क्यों वादा तोड़ चले जाते हो साहब
झूटी शानो शोकत और पैसो के चक्कर में भी तो
जीवन में अपने प्यारो से ही धोखा खाते हो साहब
जीवन की राहो में तुम गिरकर सम्हल जाते हो लेकिन
मोहब्बत की गलियों में क्यों हर बार गिरते हो साहब

